Save the Childrens Global Report on Newborn Deaths

At the launch of Save the Children’s global report on Newborn deaths, Civil Society Organizations took pledge to bring down Neonatal Mortality rate in Bihar

Save the Children's Global Report on Newborn Deaths

Patna, 03 March 2014. To curb under 5 mortality, the focus must be on ensuring that children survive their first day of birth, reveals Save the Children’s new global report ‘Ending newborn deaths, ensuring every baby survives’ which was launched by Shri Awadhesh Narain Singh, Chairman, Bihar Legislative Council here today. There are still 1.01 million babies who died on their first day of life in 2012. The report shows that while there has been significant progress on ensuring child survival in India, the fact that 45 per cent of neo-natal deaths occur on the 1st day of birth in India is stalling progress on achieving MDG 4. India accounts for an astounding 35 per cent of the global deaths of newborns on their very first day of birth. About half the first-day deaths around the world could be prevented if every mother and baby had access to free and quality health care and skilled birth attendants.

Shri Awadhesh Narain Singh shared “India and Bihar has made a lot of progress in terms of child survival, still we need to ensure that every child is saved.” Among others who participated in a discussion at the report’s launch were Dr. S. P. Srivastava, Retd. Professor & Head, Department of Paediatrics, PMCH, Dr. Shakeel ur Rehman, Convenor Jan Swashthya Abhiyaan, Bihar and Rafay Eajaj Hussain, State Programme Manager, Bihar, Save the Children.
“If we want to achieve MDG 4 by 2015, we have to focus on ensuring survival on the first day of birth and we need to ensure that a child does not die due to preventable reasons,” Rafay Eajaj Hussain stated, and added: “Our report reveals the true scale of the newborn crisis. Without targeted action now, progress made in cutting child mortality will stall.”
Brajeshwar Prasad, Save the Children shared findings of assessment of neonatal deaths in Gaya and Sitamarhi, as per this small scale study conducted by Save the Children, in Mohanpur block of Gaya district, 46% newborn died within 24 hours from their births and another 21% passed away within 3 days. In Reega block of Sitamarhi, only 59% deliveries were carried in institutional setting, whereas in Mohanpur mere 50%. In Mohanpur 40% neonatal deaths occurred due to Asphyxia and another 33% due to neonatal infections.

With the Call to Action on Child Survival, the Government of India has demonstrated a high level of commitment and political will towards ensuring child survival. India has the technical know-how; what is required is a greater urgency to ongoing efforts and focus on the poorest and the most marginalised groups. The report also highlights that equity is a critical factor – the newborn mortality rate among the wealthiest 20% of India’s population is 26 per 1,000 babies, while among the poorest households 56 per 1,000 who die in the very first month of life. Save the Children believes that there are four essential areas for neonatal care that need to be addressed: warmth, initial breastfeeding, hygiene and resuscitation (if required). In keeping with the momentum, Save the Children recommends:
Every mother and very newborn must have access to free, effective health care that will save their lives through a continuum of care approach
Inequity that persists among different social groups and across varying geographical divides must be tackled so that every mother and child must get requisite care
The world has made dramatic progress with nearly halving child mortality from 12.6 million in 1990 to 6.6 million over the past decade – thanks to significant advances with immunisation, treatment of pneumonia, diarrhoea, and malaria, family planning and nutrition. This report warns that newborn deaths now account for nearly half of all under-5 deaths. Save the Children’s report says the deaths occur because of preterm birth and complications during birth – such as prolonged labour, pre-eclampsia and infections – which can be avoided if skilled health workers are present.

Dr. S. P. Srivastava stressed that in order to ensure complete development of children, it’s imperative to focus survival of new born and beyond. He noted that India has made dramatic progress in bringing the under-5 mortality from 114 in 1990 to 52 per 1000 live births in 2012, a reduction of more than 54.4 per cent, while the global reduction is at 44.8 per cent. Still a lot needed to be done, particularly in state like Bihar. Dr. Shakeel ur Rehman pointed that health as status is combination of multiple factors- social, economical, cultural and political, therefore health related concerns cannot be addressed in isolation or with mere technical approach. Bihar still marred with huge gap of health related human resource, financial resource, infrastructural support and Yet today, India also represents some of the greatest challenges in seeing this revolution through, including inequity. India has persistently high rates of newborn mortality, and accounts for 26.6 per cent of all newborn deaths globally, with 758,000 newborn deaths a year. But for the first time, the Neonatal Mortality Rate (NMR) has declined by 2 points in 2 consecutive years: from 33 to 31 per 1000 between 2010-2011; 31 to 29 per 1000 live births between 2011– 2012.

Clearly, newborn survival must be a central element of a clear national agenda for improving maternal and child health to ensure that every child survives.

Save the Children is India’s leading independent child rights organization. In India, we are working across 15 states to ensure that every child has a happy and healthy childhood.


सेव द चिल्ड्रन के रिपोर्ट के लोकार्पण के दौरान नागरिक संस्थायो ने बिहार में नवजात शिशु मृत्युदर में कमी लाने कि शप्पथ ली

03 मार्च 2014, पटना. पांच वर्ष से कम आयु के नवजातों की मृत्युदर को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी है कि उनको जन्म के पहले ही दिन बचाए जाने पर ध्यान दिया जाए. यह तथ्य सेव द चिल्ड्रन की ताज़ा वैश्विक रिपोर्ट, ‘एंडिंग न्यूबॉर्न डेथ्स, एन्श्योरिंग एवरी बेबी सर्वाइव्स’ में सामने आया है. रिपोर्ट का बिहार में लोकार्पण श्री अवधेश नारायण सिंह, अध्य़क्ष, बिहार विधान परिषद् ने किया. वर्ष 2012 में अपने जन्म के पहले दिन ही मर जाने वाले नवजातों की तादाद 10.1 लाख थी. हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों को बचाने की दिशा में सार्थक प्रयास किए गए हैं लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि नवजातों की मृत्यु के मामले में 40 प्रतिशत तादाद उनकी है जो जन्म के पहले दिन ही मौत के गाल में समा जाते है और यह भारत को एमडीजी-4 के लक्ष्य को हासिल कर पाने में एक बड़ी रुकावट है. दुनियाभर में अपने जन्म के पहले दिन मर जाने वाले नवजातों की कुल तादाद का 29 प्रतिशत भारत में देखने को मिलता है. जन्म के पहले दिन ही नवजातों की मौतों के लगभग आधे मामलों को रोका जा सकता है यदि प्रसव के दौरान माँ और बच्चे को मुफ्त में समुचित स्वास्थ्य सेवा और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके.

श्री अवधेश नारायण सिंह ने कहा, “भारत एवं बिहार में नवजातों को बचाने की दिशा में काफी प्रगति की है लेकिन हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि प्रत्येक नवजात को बचाया जा सके.” इस दौरान डॉक्टर एस. पी. श्रीवास्तव (पूर्व विभागाध्यक्ष, पेडियाट्रिक्स विभाग, पी एम सी एच), डॉक्टर शकील उर रहमान, चार्म एवं कन्वेनॉर जन स्वास्थ्य अभियान, बिहार और श्री राफे एजाज हुसैन, राज्य कार्क्रम प्रबंधक, बिहार, सेव द चिल्ड्रन ने भी परिचर्चा में हिस्सा लिया.
श्री राफे एजाज हुसैन ने कहा, “ वर्ष 2015 तक एमडीजी 4 का लक्ष्य हासिल करने हेतु हमें नवजातों के जन्म के पहले दिन ही उनको बचाए जाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई बच्चा उन वजहों से न मरे जन्हें टाला जा सकता है.” वो आगे कहते हैं, “हमारी रिपोर्ट ने नवजातों के संकट की सच्ची तस्वीर को उजागर किया है. अब यदि हम लक्ष्य-आधारित कार्यक्रम नहीं अपनाते हैं तो बच्चों की मृत्युदर में कमी लाने की दिशा में किए गए प्रयास रुक जाएंगे.”

भारत सरकार ने बाल सुरक्षा का आहवान करते हुए बच्चों को बचाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत दिया है. भारत तकनीकी रूप से यह समझ पाने में सक्षम है कि जारी प्रयासों में किन चीज़ों की तत्काल आवश्यकता है और निर्धनतम व हाशिए पर पड़े समुदायों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि गुणवत्ता एक अहम पहलू है. भारत की आबादी के 20 प्रतिशत सर्वाधिक धनी परिवारों में बच्चों की मृत्युदर प्रति 1000 पर 26 बच्चों की है. जबकि निर्धनतम परिवारों में मृत्युदर प्रति 1000 बच्चों पर 56 की है जो अपने जन्म के पहले महीने में ही मर जाते हैं. सेव द चिल्ड्रन का मानना है कि नवजातों की देखरेख के ऐसे चार बिंदु हैं जिनपर ध्यान देने की ज़रूरत है. ये हैं उनको उचित गर्माहट देना, स्तनपान, सफाई और ज़रूरत पड़ने पर जीवनदायी प्रयास.

प्रत्येक मां और नवजात को मुफ्त और प्रभावी स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता होनी ही चाहिए ताकि देखरेख के अबाध प्रयासों स उनके जीवन को बचाया जा सके.
भौगोलिक विभाजन और अलग-अलग सामाजिक स्थितियों के चलते जो असमानता देखने को मिलती है, उससे भी निपटने की ज़रूरत है ताकि प्रत्येक मां और बच्चे की आवश्यक देखरेख सुनिश्चित की जा सके.

दुनियाभर में बच्चों की मृत्युदर को कम करने के प्रयासों के चलते सहारनीय प्रगति देखने को मिल रही है और 1990 में एक करोड़, 26 लाख बच्चों की मृत्यु का आंकड़ा पिछले एक दशक में गिरकर 66 लाख तक आ गया है. इसके लिए रोग प्रतिरक्षण कार्यक्रमों, निमोनिया, डायरिया, मलेरिया के इलाज, परिवार नियोजन और पोषण के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए. हालांकि रिपोर्ट यह चेतावनी भी देती है कि अब पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मौत के मामलों में लगभग आधी तादाद नवजातों की है. सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट यह भी बताती है कि नवजातों की मौत के कारणों में समय से पहले प्रसव और जन्म, जन्म के दौरान जटिलताएं- जैसे लंबा प्रसव, संक्रमण आदि हैं जिन्हें प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी सुनिश्चित कराकर टाला जा सकता है.

श्री ब्रजेश्वर प्रसाद ने गया एवं सीतामढ़ी में सेव द चिल्ड्रन दवारा किये गए स्टडी की रिपोर्ट की जानकारी देते हुआ बताया कि गया के मोहनपूर ब्लाक में ४६% नवजात चोबीस घंटो के अंदर ही मृत्यु को प्राप्त कर लिया और २१% तीन दिन तक जीवित रह पाये. सीतामढ़ी के रीगा ब्लाक में जहा ५९% संसथागत् प्रसव हुआ, वही मोहनपुर में सिर्फ ५०% प्रसव संसथागत् रहा.

डॉक्टर एस. पी. श्रीवास्तव ने कहा कि जरुरत इस बात कि है की हम बच्चों कि उत्तरजीवता और उसके परे भी देखे अन्यथा बच्चों के सम्पूर्ण विकास के लक्ष्य अधूरे ही रह जायगे. भारत ने पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्युदर में सराहनीय गिरावट दर्ज की है. वर्ष 1990 में प्रति 1000 बच्चों पर यह आंकड़ा 114 बच्चों का था जो कि वर्ष 2012 तक घटकर 52 पर आ गया है. भारत में बच्चों की मृत्युदर में 54.4 प्रतिशत की यह गिरावट वैश्विक स्तर पर गिरावट के 44.8 प्रतिशत के आंकड़े से अधिक है. हालाकि इस दिशा में अभी बहुत कुछ और करने कि जरुरत है. डॉक्टर शकील उर रहमान, चार्म ने बताया कि स्वस्थ्य के मुद्दो को सिर्फ तकनिकी एवं आकड़े कि नज़र से नहीं देखा जा सकता है क्योकि उसके सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक एवं सांस्कृतिक पहलु भी है. जररूरत इस बात कि है कि हम इन सभी आयामो को नज़र में रखते हुए नवजात मृत्यु के मुद्दो के पर काम करे.

हालांकि आज, भारत इस बड़े क्रांतिकारी बदलाव की ओर बढ़ पाने की दिशा में असमानता जैसी कई जटिलतम चुनौतियों का सामना भी कर रहा है. भारत में नवजातों की मृत्युदर अभी भी काफी ऊपर है और 7,58,000 नवजातों की प्रति वर्ष मौत के आंकड़े के कारण भारत दुनियाभर में नवजातों की मौत के आंकड़े में 26.6 प्रतिशत हिस्सेदार है. लेकिन यह भी पहली बार हुआ है कि नवजात मृत्यु-दर (एनएमआर) में दो वर्षों में दो

प्रतिशत की कमी आई है: यह आकड़ा वर्ष 2010-11 में प्रति 1000 बच्चे पर 33 से घटकर 31 और वर्ष 2011-12 में प्रति 1000 नवजातों पर 31 से घटकर 29 हुआ है.

स्पष्ट है कि नवजातों को बचाना देश के राष्ट्रीय एजेंडे का केंद्रीय तत्व होना चाहिए ताकि मातृ एवं बाल स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार हो और हर बच्चे का जीवन सुनिश्चित किया जा सके.

सेव द चिल्ड्रन भारत का एक अग्रणी और स्वतंत्र बाल अधिकार संगठन है. हम भारत के 15 राज्यों में काम कर रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर बच्चे को एक सुखमय और स्वस्थ बचपन मिल सके.